Diller

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Sayfa 86 / 251

Yazar: प्रेमचंद

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दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे तो तीन बज गये। अबकी मिर्जाजी की
बाजी कमजोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज की वापसी की आहट
मिली। नवाब वाजिदअली शाह पकड़ लिये गये थे, और सेना उन्हें किसी
अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट।
एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा को
पराजय इतनी शांति से, इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यह वह अहिंसा
न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं। यह वह कायरपन था, जिस पर
बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नावाब
बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह
राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।
मिर्जा ने कहा--हुजूर नवाब, साहब को ज़ालिमो ने क़ैद कर लिया है।
मीर--होगा, यह लीजिए शह!
मिर्जा--जनाब जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीअत नहीं लगती। बेचारे नवाब
साहब इस वक्त खून के आँसू रो रहे होंगे।
मीर--रोया ही चाहें, यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा--यह किश्त!
मिर्जा--किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्द़नाक हालत है।
मीर--हाँ, सो तो है ही--यह लो, फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात
है। बच नहीं सकते।

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