Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 85 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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मिर्जा--जनाब, हीले न कीजिए। ये चकमे किसी और को दीजिएगा यह किश्त!
मीर--आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आयी हुई है, और आपको
किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है कि शहर घिर गया, तो घर कैसे
चलेंगे?
मिर्जा--जब घर चलने का वक्त आयेगा, तो देखी जायगी--बह किश्त! बस
अबकी शह में मात है।
फौज निकल गयी। दस बजे का समय था। फिर बाजी बिछ गयी।
मिर्जा बोले--आज खाने की कैसी ठहरेगी?
मीर--अजी, आज तो रोजा है। क्या आपको भूख ज्यादा मालूम होती है?
मिर्जा--जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।
मीर--शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना खा-खाकर आराम से सो रहे
होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।
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