Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मिर्जा-बराबर के आदमी हैं, उम्र में, दर्जे में मुझसे दो अगुल ऊँचे।
मुलाहिजा करना ही पड़ता है।
बेगम-तो मैं ही दुत्कारे देती हूँ। नाराज हो जायँगे, हो जायँ। कौन
किसी की रोटियाँ चला देता है। रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी।
हिरिया, जा, बाहर से शतरंज उठा ला। मीर साहब से कहना, मियाँ अब न
खेलेगे, आप तशरीफ ले जाइए।
मिर्जों-हाँ-हाँ, कहाँ ऐसा गजब भी न करना! जलील करना चाहती हो क्या!
ठहर हिरिया कहाँ जाती है।
बेगम-जाने क्यों नहीं देते। मेरा ही खून पिये, जो उसे रोके। अच्छा,
उसे रोका, मुझे रोको, तो जानूँ।
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