Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 147 di 251
Autore: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocita (WPM)0.0
Precisione100.0%
Premi inizia e digita le righe esattamente. · Backspace disattivato — continua anche dopo un errore.
उसी साल मेरा तबादला हो गया। यद्यपि यहाँ का जलवायु मेरे अनुकूल था,
प्रिंसिपल और अन्य अध्यापकों से मैत्री हो गयी थी, मगर मैं अपने
तबादले से खुश हुआ, क्योंकि सूर्यप्रकाश मेरे मार्ग का काँटा न
रहेगा। लड़कों ने मुझे बिदाई की दावत दी, और सब-के-सब स्टेशन तक
पहुँचाने आये। उस वक्त सभी लड़के आँखों में आँसू भरे हुए थे! मैं भी
अपने आँसुओं को न रोक सका। सहसा मेरी निगाह सूर्यप्रकाश पर पड़ी, जो
सबसे पीछे लजित खड़ा था। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि उसकी आँखें भी भीगी
थीं। मेरा जी बार-बार चाहता था कि चलते-चलते उससे दो-चार बातें कर
लूँ। शायद वह भी मुझसे कुछ कहना चाहता था; मगर न मैंने पहले बातें
कीं, न उसने; हालाँकि मुझे बहुत दिनों तक इसका खेद रहा। उसकी झिझक
तो क्षमा के योग्य थी; पर मेरा अवरोध अक्षम्य था। संभव था, उस करुणा
और ग्लानि की दशा में मेरी
Premi inizia e digita le righe esattamente.
Non iniziato