Buch · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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किन्तु इस समय लोगों को वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने
की कि इसे इतना धन मिल कहाँ से गया? किसी को महादेव के पास आने का
साहस न हुआ। देहात के आदमी थे, गड़े मुर्दे उखाड़ना क्या जाने। फिर
प्रायः लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या पाना है, और
ऐसे पवित्र अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका मुँह बन्द किये हुए
था। सब से बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हें वशीभूत कर
लिया था।
अचनाक पुरोहितजी बोले-'तुम्हें याद है, मैंने एक कंठा बनाने के लिए
सोना दिया था, और तुमने कई माशे तौल में उड़ा दिये थे।
महादेव---'हाँ, याद है। आपका कितना नुकसान हुआ होगा?'
पुरोहित--५०) से कम न होगा।'
महादेव ने कमर से दो मोहरें निकाली, और पुरोहितजी के सामने रख दी।
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