Diller

Klavye

Sayfa 94 / 251

Yazar: प्रेमचंद

Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.

उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह बड़ी बात थी। मेरा जी
पढ़ने में बिल्कुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़
था। मौका पाते ही होस्टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी
कंकरियाँ उछालता, कभी कागज की तितलियाँ उड़ाता, और कहीं कोई साथी
मिल गया, तो पूछना ही क्या। कभी चारदीवारी पर चढ़कर नीचे कूद रहे
हैं, कभी फाटक पर सवार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनन्द
उठा रहे हैं, लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का वह रौद्र-रूप देखकर
प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-'कहाँ थे?' हमेशा यही सवाल,
इसी ध्वनि में हमेशा पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन
था। न जाने मेरे मुंह से यह बात क्यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा
था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब
के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए
शब्दों में मेरा सत्कार करें।

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.

Başlatılmadı