Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 244 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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रामलीला समाप्त हो गयी थी। राजगद्दी होने वाली थी; पर न जाने क्यों
देर हो रही थी। शायद चन्दा कम वसूल हुआ था। रामचन्द्र की इन दिनों
कोई बात भी न पूछता था। न तो घर जाने की छुट्टी मिलती। थी, न भोजन
का प्रबन्ध ही होता था। चौधरी साहब के यहाँ से एक सीधा कोई तीन बजे
दिन को मिलता था। बाकी सारे दिन कोई पानी को भी न पूछता; लेकिन मेरी
श्रद्धा अभी तक ज्यों-की-त्यों थी। मेरी दृष्टि में वह अब भी
रामचन्द्र ही थे। घर पर मुझे खाने की जो चीज मिलती, वह लेकर
रामचन्द्र को दे पाता। उन्हें खिलाने में मुझे जितना आनन्द मिलता
था, उतना खा जाने में कभी न मिलता। कोई मिठाई या फल पाते ही मैं
बेतहाशा चौपाल की ओर दौड़ता। अगर रामचन्द्र वहाँ न मिलते, तो उन्हें
चारों ओर तलाश करता, और जब तक वह चीज उन्हें न खिला लेता, मुझे चैन
न आता था। खैर राजगद्दी का दिन आया। रामलीला के मैदान में एक
बड़ा-सा शामियाना ताना गया। उसकी खूब सजावट की गयी। वेश्याओं के दल
भी आ पहुँचे। शाम को रामचन्द्र की सवारी निकली और प्रत्येक द्वार पर
उनकी आरती उतारी गयी। श्रद्धानुसार किसी ने रुपये दिये, किसी ने
पैसे। मेरे पिता पुलिस के आदमी थे; इसलिए उन्होंने बिना कुछ दिये ही
आरती उतारी। इस वक्त मुझे जितनी लज्जा आयी, उसे बयान नहीं कर सकता।
मेरे पास उस वक्त संयोग से एक रुपया था; मेरे मामाजी दशहरे के पहले
आये थे और मुझे एक रुपया दे गये थे। उस रुपये को मैंने रख छोड़ा था।
दशहरे के दिन भी उसे खर्च न कर सका। मैंने तुरंत वह रुपया लाकर आरती
की थाली में डाल दिया। पिताजी मेरी ओर कुपित नेत्रों से देखकर रह
गये। उन्होंने कुछ कहा तो नहीं; लेकिन मुँह ऐसा बना लिया, जिससे
प्रकट होता था कि मेरी इस धृष्टता से उनके रोब में बट्टा लग गया।
रात के दस बजते-बजते यह परिक्रमा पूरी हुई। आरती की थाली रुपयों और
पैसों से भरी हुई थी। ठीक तो नहीं कह सकता, मगर अब ऐसा अनुमान होता
है कि ४-५ सौ रुपयों से कम न थे। चौधरी साहब इनसे कुछ ज्यादा ही
खर्च कर चुके थे। उन्हें इसकी बड़ी फिक्र हुई कि किसी तरह कम से कम
२००) और वसूल हो जायँ। और, इसकी सबसे अच्छी तरकीब उन्हें यही मालूम
हुई कि वेश्याओं-द्वारा महफिल में वसूल हो। जब लोग आकर बैठ जायें और
महफिल का रङ्ग जम जाये, तो आबदीजान रसिकजनों की कलाइयाँ पकड़-पकड़कर
ऐसे हाव-भाव दिखावे कि लोग शरमाते-शरमाते भी कुछ-न-कुछ दे ही मरे।
आबदीजान और चौधरी साहब में सलाह होने लगी। मैं संयोग से उन दोनों
प्राणियों की बातें सुन रहा था। चौधरी साहब ने समझा होगा, यह लौंडा
क्या मतलब समझेगा; पर यहाँ ईश्वर की दया से अक्ल के पुतले थे। सारी
दास्तान समझ में आती जाती थी।
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