Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 229 / 251
Yazar: प्रेमचंद
Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.
चौधरी-हाँ, पर आज से अदालत जाऊँ तो मुझे गऊहत्या का पाप लगे।
तुम्हें चाहिए कि तुम अपनी गाढ़ी कमाई अपने बाल-बच्चों को खिलाओ, और
बचे तो परोपकार में लगाओ, वकील-मुख्तारों की जेब क्यों भरते हो?
थानेदार को घूस क्यों देते हो, अमलों की चिरौरी क्यों करते हो? पहले
हमारे लड़के अपने धर्म को शिक्षा पाते थे, वे सदाचारी, त्यागी,
पुरुषार्थी बनते थे। अब वे विदेशी मदरसों में पढ़कर चाकरी करते हैं,
घूस खाते हैं, शोक करते हैं, अपने देवताओं और पितरों की निन्दा करते
हैं, सिगरेट पीते हैं, बाल बनाते हैं और हाकिमों को गोड़ धरिया करते
हैं। क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम अपने बालकों को
धर्मानुसार शिक्षा दें?
जनता-चन्दे से पाठशाला खोलनी चाहिए।
चौधरी-हम पहिले मदिरा छूना पाप समझते थे, अब गाँव-गाँव और गली-गली
में मदिरा की दूकानें हैं। हम अपनी गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये
गाँजे-शराब में उड़ा देते हैं।
जनता-जो दारू-भाँग पीये, उसे डाँड़ लगाना चाहिए।
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.
Başlatılmadı