Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 235 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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लेकिन भगतजी इतने भाग्यशाली न थे। जनता को दिनो-दिन उनके उपदेशों से
अरुचि होती जाती थी। यहाँ तक कि बहुधा उनके श्रोताओं में पटवारी,
चौकीदार, मुदर्रिस, और इन्हीं कर्मचारियों के मेली-मित्रों के
अतिरिक्त और कोई न होता था। कभी कभी बड़े हाकिम भी आ निकलते और
भगतजी का बड़ा आदर-सत्कार करते, जरा देर के लिए भगतजी के आँसू पुँछ
जाते, लेकिन क्षण-भर का सम्मान आठों पहर के अपमान की बराबरी कैसे
करता! जिधर निकल जाते उधर ही उँगलियाँ उठने लगतीं। कोई कहता खुशामदी
टट्टू है, कोई कहता खुफिया पुलिस
का भेदी है। भगतजी अपने प्रतिद्वंदी की बड़ाई और अपनी लोक-निन्दा पर
दाँत पीसकर रह जाते थे। जीवन में यह पहला ही अवसर था कि उन्हें अपने
शत्रु के सामने नीचा देखना पड़ा--चिरकाल से जिस कुल-मर्यादा की
रक्षा करते आये थे और जिस पर अपना सर्वस्व अर्पण कर चुके थे वह धूल
में मिल गयी। यह दाहमय चिन्ता उन्हें एक क्षण के लिए चैन न लेने
देती। नित्य यही समस्या सामने रहती कि अपना खोया हुआ सम्मान क्योंकर
पाऊँ, अपने प्रतिपक्षो को क्योकर पददलित करूँ? उसका गरूर क्योंकर
तोड़ूँ?
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