Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 209 / 251
Yazar: प्रेमचंद
Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.
पुरोहित की लोलुपता पर टीकाएँ होने लगीं-'यह बेईमानी है, बहुत हो तो
दो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा। बेचारे से ५०) ऐंठ लिये। नारायण
का भी डर नहीं। बनने को पंडित, पर नीयत ऐसी खराब! राम-राम!!' लोगो
को महादेव पर एक श्रद्धा-सी हो गयी। एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रों
मनुष्य में से एक भी न खड़ा हुआ तब महादेव ने फिर कहा-'मालूम होता
है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं। इसलिए आज कथा होने दीजिए,
मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला
जाऊँगा। आप सब भाइयों से मेरी बिनती है कि आप मेरा उद्धार करें।
एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोरों के भय
से नींद न आती। अब वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा।
साधु-अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य सत्कार करता।
दूर-दूर उसका सुयश फैल गया। यहाँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक
आदमी भी हिसाब लेने न आया। अब महादेव को ज्ञात हुआ कि संसार में
कितना धर्म, कितना सम्व्यवहार है! अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों
के लिए बुरा है, और अच्छों के लिए अच्छा।
( ६ )
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.
Başlatılmadı