Книга · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Автор: प्रेमचंद
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मैं शत्रु था; पर अब मुझसे बढ़कर उन नियमों का रक्षक दूसरा न था।
मैं ईश्वर का उपहास किया करता था, मगर अब पक्का आस्तिक हो गया था।
वह बड़े सरल भाव से पूछता, परमात्मा सब जगह रहते हैं, तो मेरे पास
भी रहते होंगे। इस प्रश्न का मजाक उड़ाना मेरे लिए, असंभव था। मै
कहता -- हाँ, परमात्मा तुम्हारे, हमारे, सबके पास रहते हैं और हमारी
रक्षा करते हैं। यह आश्वासन पाकर उसका चेहरा आनन्द से खिल उठता था,
कदाचित् वह परमात्मा को सत्ता का अनुभव करने लगता था। साल ही भर में
मोहन कुछ-से-कुछ हो गया। मामा साहब दोबारा आये, तो उसे देखकर चकित
हो गये। आँखों में आँसू भर कर बोले -- बेटा! तुमने इसको जिला लिया,
नहीं तो मैं निराश हो चुका था। इसका पुनीत फल तुम्हें ईश्वर देंगे।
इसकी माँ स्वर्ग में बैठी हुई तुम्हें आशीर्वाद दे रही है।
सूर्यप्रकाश की आँखें उस वक्त भी सजल हो गयी थीं।
मैने पूछा -- मोहन भी तुम्हें बहुत प्यार करता होगा!
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