Книга · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Страница 188 из 251
Автор: प्रेमचंद
Время0:00
Скорость (WPM)0.0
Точность100.0%
Нажмите старт и печатайте строки точно. · Backspace отключен — продолжайте даже после ошибки.
सोचा था, वहाँ देहात में एकाग्र होकर खूब पढ़ेंगे; पर यहाँ सारा दिन
सैर-सपाटे में कट जाता था। कहीं नदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं;
कहीं मछलियो या चिड़ियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की
कुश्ती देख रहे हैं, कहीं शतरंज पर जमे हैं। ईश्वरी खूब अण्डे
मँगवाता और कमरे में 'स्टोव पर आमलेट बनते। नौकरों का एक जत्था
हमेशा घेरे रहता। अपने हाथ-पाँव हिलाने की कोई जरूरत नहीं। केवल
जबान हिला देना काफी है। नहाने बैठे तो आदमी नहलाने को हाजिर, लेटे
तो दो आदमी पंखा झलने को खड़े। मै महात्मा गांधी का कुँवर चेला
मशहूर था। भीतर से बाहर तक मेरी धाक थी। नाश्ते में जरा भी देर न
होने पाये, कहीं कुँवर साहब नाराज न हो जायँ। बिछावन ठीक समय पर लग
जाय, कुंँवर साहब का सोने का समय आ गया। मैं ईश्वरी से भी ज्यादा
नाजुक दिमाग बन गया था, या बनने पर मजबूर किया गया था। ईश्वरी अपने
हाथ से बिस्तर बिछा ले; लेकिन कुँवर मेहमान अपने हाथों कैसे अपना
बिछावन बिछा सकते हैं! उनकी महानता में बट्टा लग जायगा।
Нажмите старт и печатайте строки точно.
Не начат