Книга · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Страница 178 из 251
Автор: प्रेमचंद
Время0:00
Скорость (WPM)0.0
Точность100.0%
Нажмите старт и печатайте строки точно. · Backspace отключен — продолжайте даже после ошибки.
पदनेवालों में एक युवक ने कुछ धाँधली की। उसने अपने विचार में
गुल्ली लोंक ली थी। गया का कहना था-गुल्ली जमीन में लगकर उछली थी।
इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आयी। युवक दब गया। गया का
तमतमाया हुआ चेहरा देखकर वह डर गया। अगर वह दब न जाता, तो जरूर
मार-पीट हो जाती। मैं खेल में न था; पर दूसरों के इस खेल में मुझे
वही लड़कपन का आनन्द पा रहा था, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो
जाते थे। अब मुझे मालूम हुआ कि कल गया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल
खेलने का बहाना किया। उसने मुझे दया का पात्र समझा। मैंने धाँधली
की, बेईमानियाँ की; पर उसे जरा भी क्रोध न आया, इसलिए कि वह खेल न
रहा था, मुझे खेला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझे पदाकर मेरा
कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं अब अफसर हूँ। यह अफसरी मेरे और
उसके बीच में दीवार बन गयी है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, अदब
पा सकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष
था। हममें कोई भेद न था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया के योग्य
हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो
गया हूँ।
Нажмите старт и печатайте строки точно.
Не начат