Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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यह कहकर विप्रजी ने उस सवा सेर गेहूँ का जिक्र किया, जो आज के ७
वर्ष पहले शंकर को दिये थे। शंकर सुनकर आवक् रह गया। ईश्वर! मैने
इन्हें कितनी बार खलिहानी दी, इन्होंने मेरा कौन-सा काम किया। जब
पोथी-पत्रा देखने, साइत-सगुन विचारने द्वार पर आते थे, कुछ-न-कुछ
'दक्षिना' ले ही जाते थे। इतना स्वार्थ! सवा सेर अनाज को अंडे की
भाँति सेकर आज यह पिशाच खड़ा कर दिया, जो मुझे निगल जायगा। इतने
दिनों में एक बार भी कह देते तो मै गेहूँ तौलकर दे देता, क्या इसी
नीयत से चुप सीधे बैठे रहे! बोला-महाराज, नाम लेकर तो मैने उतना
अनाज नहीं दिया, पर कई बार खलिहानी में सेर-सेर दो-दो सेर दिया है।
अब नाप आज साढ़े पाँच मन माँगते हैं, मै कहाँ से दूँगा!
विप्र-लेखा जौ-जौ! बखसीस सौ-सौ! तुमने जो कुछ दिया होगा, उसका कोई
हिसाब नहीं, चाहे एक की जगह चार पंसेरी दे दो। तुम्हारे नाम बही में
साढ़े पाँच मन लिखा हुआ है, जिससे चाहे हिसाब लगवा लो। दे दो तो
तुम्हारा नाम छेंक दूंँ, नहीं तो और भी बढ़ता रहेगा।
शकर-पाँडे, क्यों एक गरीब को सताते हो, मेरे खाने का ठिकाना नही,
इतना गेहूँ किसके घर से लाऊँगा?
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