Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 183 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocidade (WPM)0.0
Precisao100.0%
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente. · Backspace desativado — continue mesmo apos erro.
भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे। स्टेशन पर कई आदमी हमारा
स्वागत करने के लिए खड़े थे। दो भद्र पुरुष थे। पाँच बेगार। बेगारों
ने हमारा लगेज उठाया। दोनों भद्र पुरुष पीछे-पीछे चले। एक मुसलमान
था, रियासत अली; दूसरा ब्राह्मण था, रामहरख। दोनों ने मेरी ओर
अपरिचत नेत्रों से देखा, मानों कह रहे हैं, तुम कौवे होकर हंस के
साथ कैसे?
रियासत अली ने ईश्वरी से पूछा-यह बाबू साहब क्या आपके साथ पढ़ते
हैं?
ईश्वरी ने जवाब दिया-हाँ, साथ पढ़ते भी हैं, और साथ रहते भी हैं।
यों कहिए कि आप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूँ, नहीं कब का
लखनऊ चला आया होता। अबकी मैं इन्हें घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ
चुके थे; मगर मैंने इन्कारी जवाब दिलवा दिये। आखिरी तार तो अर्जेंट
था, जिसको फीस चार आने प्रति शब्द है; पर यहाँ से भी उसका जवाब
इन्कारी ही गया।
दोनों सज्जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा। आतंकित हो जाने को
चेष्टा करते हुए जान पड़े। रियासत अली ने अर्द्धशंका के स्वर में
कह-लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente.
Nao iniciado