Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते
नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़
गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थेलियाँ और
अम्मीजान नियामतें लेकर आयेंगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब
देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे!
अभागिन अमीना अपनो कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके
घर में दाना नहीं! आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली
जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था
इस निगोड़ी ईद को! इस घर में उसका काम नहीं लेकिन हामिद! उसे किसी
के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति
अपना सारा दल-बल लेकर आये, हामिद की आनन्द-भरी चितवन उसका विध्वंस
कर देगी। हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है-तुम डरना नहीं अम्माँ,
मैं सबसे पहले आऊँगा। बिलकुल न डरना।
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