Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 224 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocidade (WPM)0.0
Precisao100.0%
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente. · Backspace desativado — continue mesmo apos erro.
विप्र-गुलामी समझो, चाहे मजदूरी समझो। मैं अपने रूपये भराये बिना
तुमको कभी न छोङूँगा। तुम भागोगे तो तुम्हारा लड़का भरेगा। हाँ, जब
कोई न रहेगा तब की बात दूसरी है।
इस निर्णय की कहीं अपील न थी। मजूर की जमानत कौन करता! कहीं शरण न
थी, भागकर कहाँ जाता; दूसरे दिन से उसने विप्रजी के यहाँ काम करना
शुरू कर दिया। सवा सेर गेहूँ की बदौलत उम्र-भर के लिए गुलामी की
बेड़ी पैरों में डालनी पड़ी। उस अभागे को अब अगर किसी विचार से
संतोष होता था तो यह था कि यह मेरे पूर्व जन्म का संस्कार है।
स्त्री को वे काम करने पड़ते थे, जो उसने कभी न किये थे, बच्चे
दानों को तरसते थे, लेकिन शंकर चुपचाप देखने के सिवा और कुछ न कर
सकता था। गेहूँ के दाने किसी देवता के शाप की भाँति यावजीवन उसके
सिर से न उतरे।
( ४ )
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente.
Nao iniciado