Boek · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 127 van 251
Auteur: प्रेमचंद
Tijd0:00
Snelheid (WPM)0.0
Nauwkeurigheid100.0%
Druk op start en typ de regels precies na. · Backspace uitgeschakeld — ga door, ook na een fout.
विक्रम के पिता बड़े ठाकुर साहब, और ताऊ छोटे ठाकुर साहब दोनों
जड़वादी थे, पूजा-पाठ की हँसी उड़ानेवाले, पूरे नास्तिक; मगर अब
दोनों बड़े निष्ठावान् और ईश्वर-भक्त हो गये थे। बड़े ठाकुर साहब तो
प्रातःकल गंगा-स्नान करने जाते और मन्दिरों के चक्कर लगाते हुए
दोपहर को सारी देह में चन्दन लपेटे घर लौटते। छोटे ठाकुर साहब घर पर
ही गर्म पानी से स्नान करते और गठिया से ग्रस्त होने पर भी राम-नाम
लिखना शुरू कर देते। धूप निकल आने पर पार्क की ओर निकल जाते और
चींटियों को आटा खिलाते। शाम होते ही दोनों भाई अपने ठाकुरद्वारे
में जा बैठते और आधी रात तक भागवत् की कथा तन्मय होकर सुनते। विक्रम
के बड़े भाई प्रकाश को साधु-महात्माओं पर अधिक विश्वास था। वह मठों
और साधुत्रों के अखाड़ों और कुटियों की खाक छानते, और माताजी को तो
भोर से आधी रात तक स्नान, पूजा और व्रत के सिवा दूसरा काम ही न था।
उस उम्र में भी उन्हें सिगार का शौक था; पर आजकल पूरी तपस्विनी बनी
हुई थीं। लोग नाहक लालसा को बुरा कहते हैं। मैं तो समझता हूँ, हममें
जो यह भक्ति और निष्ठा और धर्म-प्रेम है, वह केवल हमारी लालसा,
हमारी हवस के कारण। हमारा धर्म हमारे स्वार्थ के बल पर टिका हुआ है।
हवस मनुष्य के मन और बुद्धि का इतना संस्कार कर सकती है, यह मेरे
लिए बिलकुल नया अनुभव था। हम दोनों भी ज्योतिषियों और पंडितों से
प्रश्न करके अपने को कभी दुःखी कर लिया करते थे।
Druk op start en typ de regels precies na.
Niet gestart