도서 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251페이지 중 196페이지
저자: प्रेमचंद
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महादेव का पारिवारिक जीवन सुखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुएँ
थीं, दर्जनों नाती-पोते थे; लेकिन उसके बोझ को हलका करनेवाला कोई न
था। लड़के कहते-'जब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनन्द भोग लें,
फिर तो ढोल गले पड़ेगा ही। बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही
रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगन-भेदी
निर्घोष होता कि वह भूखा ही उठ आता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ
सो जाता। उसका व्यावसायिक जीवन, और भी अशांतिकारक था। यद्यपि वह
अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक
और उसकी रासायनिक क्रियाएँ कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे
आये दिन शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते थे।
पर महादेव अविचलित
गम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता। ज्योंही यह कलह शान्त
होता, वह अपने तोते की ओर देखकर पुकार उठता-'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त
दाता'। इस मन्त्र के जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शान्ति प्राप्त हो
जाती थी।
( २ )
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