本 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251ページ中131ページ
著者: प्रेमचंद
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उसने निर्लज्जता से कहा-तो क्या तुम यह साबित करना चाहते हो, कि ऐसी
दशा में तुम्हारी नीयत न बदलती?
'मेरी नियत इतनी कमजोर नहीं है।
'रहने भी दो। बड़े नियतवाले! अच्छे-अच्छों को देखा है!
'तुम्हें इसी वक्त लेख-बद्ध होना पड़ेगा। मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास
नहीं रहा।'
"अगर तुम्है मेरे ऊपर विश्वास नहीं है, तो मैं भी नहीं लिखता।'
'तो क्या तुम समझते हो, तुम मेरे रुपये हजम कर जाओगे।' 'किसके रुपये
और कैसे रुपये?'
'मैं कहे देता हूँ विक्रम, हमारी दोस्ती का ही अन्त हो जायगा; बल्कि
इससे कहीं भयंकर परिणाम होगा।'
हिंसा की एक ज्वाला-सी मेरे अन्दर दहक उठी।
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