Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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अबकी दशहरे की छुट्टियों में मैने निश्चय किया कि घर न जाऊँगा? मेरे
पास किराये के लिए रुपये न थे और न मैं घरवालों को तकलीफ देना चाहता
था। मै जानता हूँ, वे मुझे जो कुछ देते हैं वह उनकी हैसियत से बहुत
ज्यादा है। इसके साथ ही परीक्षा का भी खयाल था। अभी बहुत-कुछ पढ़ना
बाकी था और घर जाकर कौन पढ़ता है। बोर्डिङ्ग-हाउस में भूत की तरह
अकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्वरी ने मुझे अपने
घर चलने का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया। ईश्वरी
के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जायगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और
जहीन है।
उसने इसके साथ ही कहा-लेकिन भाई, एक बात का खयाल रखना। वहाँ अगर
जमींदारो की निंदा की तो मुआमिला बिगड़ जायगा और मेरे घरवालों को
बुरा लगेगा। वह लोग तो असामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि
ईश्वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है। असामी भी
यही समझता है। अगर उसे सुझा दिया जाय कि जमींदार और असामी में कोई
मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारों का कहीं पता न लगे।
मैंने कहा-तो क्या तुम समझते हो कि मैं वहाँ जाकर कुछ और हो जाऊँगा?
'हाँ, मैं तो यही समझता हूँ।'
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