Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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आखिर भाग्य के निपटारे का दिन आया-जुलाई की बीसवीं तारीख। कत्ल को
रात! हम प्रातःकाल उठे, तो जैसे एक नशा चढ़ा हुआ था, आशा और भय के
द्वन्द्व का। दोनों ठाकुरों ने घड़ी रात रहे गंगा-स्नान किया था और
मन्दिर में बैठे पूजन कर रहे थे। आज मेरे मन में श्रद्धा जागी।
मंदिर में जाकर मन-ही-मन ठाकुरजी की स्तुति करने लगा-अनाथों के नाथ,
तुम्हारी कृपा-दृष्टि क्या हमारे ऊपर न होगी? तुम्हें क्या मालूम
नहीं, हमने कितनी मुशकिल से टिकट खरीदे हैं। तुम तो अन्तर्यामी हो।
संसार में हमसे ज्यादा तुम्हारी दया कौन deserve करता है? विक्रम
सूट-बूट पहने मन्दिर के द्वार पर आया, मुझे इशारे से बुलाकर इतना
कहा-मैं डाकखाने जाता हूँ, और हवा हो गया। जरा देर में प्रकाश मिठाई
के थाल लिये हुए घर में से निकले और मंदिर के द्वार पर खड़े होकर
कंगाली को बाँटने लगे, जिनकी एक भीड़ जमा हो गयी थी। और दोनों ठाकुर
भगवान् के चरणों में लौ लगाये बैठे हुए थे, सिर झुकाये, आँखें बन्द,
अनुराग में डूबे हुए। बड़े ठाकुर ने सिर उठाकर पुजारी की ओर देखा और
बोले-भगवान् तो बड़े भक्त-वत्सल हैं, क्यों पुजारीजी?
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