Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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कह दो आकर ले जायँ। खाने की भी फुर्सत नहीं है। ले जाकर खाना सिर पर
पटक दो, खायँ, चाहे कुत्ते को खिलावें। पर रूबरू वह भी कुछ न कह
सकती थीं। उनको अपने पति से उतना मलाल न था जितना मीरसाहब से।
उन्होंने उनका नाम मीर बिगाड़, रख छोड़ा था, शायद मिर्जाजी अपनी
सफाई देने के लिए सारा इल्जाम मीर साहब ही के सिर थोप देते थे।
एक दिन बेगम साहबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौंडी से
कहा-जाकर मिर्जी साहब को बुला ला। किसी हकीम के यहाँ से दवा खावें।
दौड़, जल्दी कर। लौंडी गयी,तो मिर्जाजी ने कहा-चल, अभी आते हैं।
बेगम साहबा का मिजाज गरम था। इतनी सब कहाँ कि उनके सिर में दर्द
हो,और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौंडी से कहा-जाकर
कह, अभी चलिए, नहीं तो वह आप ही हकीम के यहाँ चली जाएँगी। मिर्जाजी
बड़ी दिलचस्प बाजी खेल रहे थे; दो ही किश्तों में मीर साहब को मात
हुई जाती थी। झुँझलाकर बोले-क्या ऐसा दम लबों पर है? जरा सब्र नहीं
होता?
मीर-अरे तो जाकर सुन ही आइए न। औरतें नाजुक-मिजाज होती ही हैं।
मिर्जा-जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ! दो किश्तों में आपको मात होती है।
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