Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर
दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आये और खड़े हो
गये। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।
झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलो को देखते ही दौड़ा और
उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनन्द के
आँसू बहने लगे। एक झूरो का हाथ चाट रहा था।
दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियाँ पकड़ ली।
भूरी ने कहा-मेरे बैल हैं।
'तुम्हारे बैल कैसे? मै मवेशीखाने से नीलाम लिये आता हूँ।'
मै तो समझता हूँ, चुराये लिये आते हो। चुपके से चले जाओ। मेरे बैल
हैं। मै बेचूंँगा, तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या
अख़तियार है!
'जाकर थाने में रपट कर दूंँगा।'
'मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।'
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