Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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मैं विकल होकर उस बछड़े की भाँति कूदने लगा जिसकी गरदन पर पहली बार
जुआ रखा गया हो। कभी लपककर नाले की ओर जाता, कभी किसी सहायक की खोज
में पीछे की तरफ दौड़ता पर सब-के-सब अपनी धुन में मस्त थे, मेरी
चीख-पुकार किसी के कानों तक न पहुँची। तब से बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ
झेली; पर उस समय जितना दुःख हुआ, उतना फिर कभी न हुआ।
मैंने निश्चय किया था कि अब रामचन्द्र से कभी न बोलूँगा, न कभी खाने
की कोई चीज ही दूंँगा; लेकिन ज्योंही नाले को पार करके वह पुल की ओर
से लौटे, मैं दौड़कर विमान पर चढ़ गया, और ऐसा खुश हुआ मानों कोई
बात ही न हुई थी।
( २ )
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