Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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उन्हीं दिनों पिताजी का वहाँ से तबादला हो गया। नयी दुनिया देखने की
खुशी में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दुःख
न हुआ। पिताजी दुःखी थे। यह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्मा जी भी
दुःखी थीं, यहाँ सब चीजें सस्ती थी, और मुहल्ले की स्त्रियों से
घराव सा हो गया था, लेकिन मैं मारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों
से जीट उड़ा रहा था, वहाँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे
घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहाँ के अँग्रेजी स्कूल में कोई
मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाय। मेरे मित्रों की फैली
हुई आँखें और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मै उनकी निगाह में कितना
ऊँचा उठ गया हूँ। बच्चों में मिथ्या को सत्य बना लेने की वह शक्ति
है, जिसे हम, जो सत्य को मिथ्या बना लेते हैं, क्या समझेंगे। उन
बेचारों को मुझसे कितनी स्पर्धा हो रही थी। मानों कह रहे थे-तुम
भागवान हो भाई, जाओ, हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना
भी।
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