Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 162 di 251
Autore: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocita (WPM)0.0
Precisione100.0%
Premi inizia e digita le righe esattamente. · Backspace disattivato — continua anche dopo un errore.
'गर्मियों की तातील थी। दो तातीलों में मोहन मेरे ही साथ रहा था।
मामाजी के आग्रह करने पर भी घर न गया। अबकी कालेज के छात्रों ने
काश्मीर-यात्रा करने का निश्चय किया और मुझे उसका अध्यक्ष बनाया।
काश्मीर-यात्रा की अभिलाषा मुझे चिरकाल से थी। इसी अवसर को गनीमत
समझा। मोहन को मामाजी के पास भेजकर मैं काश्मीर चला गया! दो महीने
के बाद लौटा, तो मालूम हुआ मोहन बीमार है। काश्मीर में मुझे बार-बार
मोहन को याद आती थी और जी चाहता था, लौट आऊँ। मुझे उस पर इतना प्रेम
है, इसका अन्दाज मुझे काश्मीर जाकर हुआ लेकिन मित्रों ने पीछा न
छोड़ा। उसकी बीमारी की खबर पाते
ही में अधीर हो उठा और दूसरे ही दिन उसके पास जा पहुंचा। मुझे देखते
ही उसके पीले और सूखे हुए चेहरे पर आनन्द की स्फूर्ति झलक पड़ी। मैं
दौड़कर उसके गले से लिपट गया। उसकी आँखों में वह दूर दृष्टि और
चेहरे पर वह अलौकिक आभा थी, जो मॅडराती हुई मृत्यु की सूचना देती
है। मैने आवेश से काँपते हुए स्वर में पूछा--यह तुम्हारी क्या दशा
है मोहन? दो ही महीने में यह नौबत पहुँच गयी? मोहन ने सरल मुस्कान
के साथ कहा-आप काश्मीर की सैर करने गये थे, मैं आकाश की सैर करने जा
रहा हूँ।
Premi inizia e digita le righe esattamente.
Non iniziato