Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 134 di 251
Autore: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocita (WPM)0.0
Precisione100.0%
Premi inizia e digita le righe esattamente. · Backspace disattivato — continua anche dopo un errore.
ठकुराइन ने देवर को दिलासा देते हुए कहा-अच्छा, मेरे रुपये में से
आधे तुम्हारे। अब तो खुश हो।
बड़े ठाकुर ने बीवी की जबान पकड़ी-क्यों आधे लेंगे? मै एक घेला भी न
दूंगा। हम मुरौवत और सुहृदयता से काम लें, फिर भी इन्हें पाँचवें
हिस्से से ज्यादा किसी तरह न मिलेगा। आधे का दावा किस नियम से हो
सकता है, न बौद्धिक, न धार्मिक, न नैतिक।
छोटे ठाकुर ने खिसियाकर कहा-सारी दुनिया का कानून आप ही तो जानते
हैं! 'जानते ही हैं, तीस साल तक वकालत नहीं की है?
यह वकालत निकल जायगी, जब सामने कलकत्ते का बैरिस्टर खड़ा कर दूंँगा।
'बैरिस्टर की ऐसी-तैसी, चाहे वह कलकत्ते का हो या लन्दन का!'
'मैं आधा लूँगा, उसी तरह जैसे घर की जायदाद में मेरा आधा है।'
इतने में विक्रम के बड़े भाई साहब सिर और हाथ में पट्टी बाँधे,
लँगड़ाते हुए, कपड़ों पर ताजे खून के दाग लगाये, प्रसन्न-मुख आकर एक
पाराम-कुरसी पर गिर पड़े। बड़े ठाकुर ने घबड़ाकर पूछा-यह तुम्हारी
क्या हालत है जी! ऐं, यह चोट कैसे लगी? किसी से मार-पीट तो नहीं हो
गयी?
प्रकाश ने कुरसी पर लेटकर एक बार कराहा, फिर मुसकराकर बोले-जी, कोई
बात नहीं, ऐसी कुछ बहुत चोट नहीं लगी।
Premi inizia e digita le righe esattamente.
Non iniziato