Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' वाली कहावत मेरी आँखों के सामने थी। मुझे
अपने बचपन की एक घटना याद आयी। होली का दिन था। शराब की एक बोतल
मँगवायी गयी थी। मेरे मामूँ साहब उन दिनों आये हुए थे। मैंने चुपके
से कोठरी में जाकर ग्लास में एक चूट शराब ढाली और पी गया। अभी गला
जल ही रहा था और आँखें लाल ही थीं, कि मामूँ साहब कोठरी में आ गये
और मुझे मानों सेंध में गिरफ्तार कर लिया और इतना बिगड़े-इतना
बिगड़े कि मेरा कलेजा सूखकर छुहारा हो गया। अम्मा ने भी डाँटा,
पिताजी ने भी डाँटा, मुझे आँसुओ से उनकी क्रोधाग्नि शान्त करनी पड़ी
और दोपहर ही को मामू साहब नशे से पागल होकर गाने लगे फिर रोये, फिर
अम्माँ को गालियाँ दीं, दादा को मना करने पर मारने दौड़े, और आखिर
में कै करके जमीन पर बेसुध पड़े नजर आये।
( ३ )
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