पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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एक दिन सन्ध्या समय एक महात्मा ने आकर उसके द्वार पर डेरा जमाया।
तेजस्वी मूर्ति थी, पीताम्बर गले में, जटा सिर पर, पीतल का कमंडल
हाथ में, खड़ाऊँ पैर में, ऐनक आँखो पर, सम्पूर्ण वेष उन महात्माओं
का-सा था, जो रईसों के प्रासादों में तपस्या, हवागाड़ियों पर
देवस्थानों की परिक्रमा और योग-सिद्धि प्राप्त करने के लिए रुचिकर
भोजन करते हैं। घर में जौ का आटा था, वह उन्हें कैसे खिलाता।
प्राचीन काल में जौ का चाहे जो कुछ महत्व रहा हो, पर वर्तमान युग
में जौ का भोजन सिद्ध पुरुषो के लिए टुष्पाच्य होता है। बड़ी चिन्ता
हुई, महात्माजी को क्या खिलाऊँ। आखिर निश्चय किया कि कहीं से गेहूँ
का आटा उधार लाऊँ, पर गांव-भर में गेहूँ का आटा न मिला। गाँव में सब
मनुष्य-ही-मनुष्य थे, देवता एक भी न था, अतएव देवताओं का पदार्थ
कैसे मिलता! सौभाग्य से गाँव के विप्र महाराज के यहाँ से थोड़े-से
मिल
गये। उनसे सवा सेर गेहूँ उधार लिया और स्त्री से कहा कि पीस दे।
महात्मा ने भोजन किया, लम्बी तानकर सोये। प्रातःकाल आशीर्वाद देकर
अपनी राह ली।
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