पुस्तक · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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लेखक: प्रेमचंद
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जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहाँ कोई गया नाम का आदमी रहता
है?
एक लड़के ने गुल्ली-डण्डा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा-कौन गया!
गया चमार?
मैंने यों ही कहा-हाँ-हांँ वही। गया नाम का कोई आदमी है तो। शायद
वही हो।
हाँ,है तो'
'जरा उसे बुला सकते हो'
लड़का दौड़ा हुआ गया और एक क्षण में एक पाँच हाथ के काले देव को साथ
लिये आता दिखायी दिया। मैं दूर ही से पहचान गया। उसकी ओर लपकना
चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ; पर कुछ सोच-कर रह गया।
बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो।
गया ने झुककर सलाम किया-हाँ मालिक, भला पहचानूंँगा क्यों नहीं? आप
मजे में रहे?
'बहुत मजे में। तुम अपनी कहो।'
'डिप्टी साहब का साईस हूँ।'
'मतई, मोहन, दुर्गा यह सब कहाँ हैं? कुछ खबर है?'
"मतई, तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिये हो गये हैं। आप"
'मैं तो जिले का इंजीनियर हूँ।'
'सरकार तो पहले ही बड़े जहीन थे।'
'अब कभी गुल्ली-डण्डा खेलते हो?
गया ने मेरी ओर प्रश्न की आँखों से देखा-अब गुल्ली-डण्डा क्या
खेलूँगा सरकार, अब तो पेट के धन्धे से छुट्टी नहीं मिलती।
'आओ, आज हम-तुम खेलें। तुम पदाना, हम पदेंगे। तुम्हारा एक दाँव
हमारे ऊपर है। वह आज ले लो।
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