Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 87 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
मिर्जा--खुदा की क़सम आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी
आपको दुःख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!
मीर--पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर जवान-साहब का मातम कीजिएगा।
यह किश्त और मात। लाना हाथ!
बादशाह को लिये हुए सेना समाने से निकल गयी। उनके जाते ही मिर्जा ने
फिर बाज़ी बिछा दी। हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा--आइए, नवाब
साहब के मातम में एक मरसिया कह डालें। लेकिन मिर्जाजी की राजभक्ति,
अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी, वह हार का बदला चुकाने के लिए
अधीर हो रहे थे।
४Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré