Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 197 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिजड़े का द्वार खोल लिया। तोता उड़
गया। महादेव ने सिर उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा
सन्न से हो गया। तोता कहाँ गया! उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता
गायब था। महादेव घबराकर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने
लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही तोता।
लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गया था। बड़कों की चुलबुल से
उसके काम में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम न था; इसलिए नहीं
कि वे निकम्मे थे, बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपने आनन्ददायी
कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वचित रह जाता था। पड़ोसियो से उसे
चिढ़ थी, इसलिए कि वह उसकी अँगीठी से भाग निकाल ले जाते थे। इन
समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो वह यही तोता। इससे
उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था, जब
मनुष्यों को शान्ति-भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।
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