Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 106 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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फिर सालाना इम्तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मैं फिर पास हुआ
और भाई साहब फिर फेल हो गये। मैने बहुत मेहनत नहीं की; पर न जाने
कैसे दरजे में अव्वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने
प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्द चाट गये थे, दस बजे
रात तक इधर, चार बजे भोर से उधर, छः से साढ़े नौ तक स्कूल जाने के
पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गयी थी; मगर बेचारे फेल हो गये। मुझे इन
पर दया आती थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने
लगा। अपने पास होने की खुशी आधी हो गयी। मैं भी फेल हो गया होता, तो
भाई साहब को इतना दुःख न होता; लेकिन विधि की बात कौन टाले।
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