Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 67 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहाँ
पचास-साठ आदमी जमा हो गये। तब दोनों मित्र निकाले गये और उनकी
देख-भाल होने लगी। लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले
जाते। ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीदार होता?
सहसा एक दढ़ियल आदमी जिसकी आँखें लाल थीं, और मुद्रा अत्यन्त कठोर,
आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशीजी से बातें
करने लगा। उसका चेहरा देखकर अन्तरज्ञान से दोनों मित्रों के दिल
काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में
उन्हें कोई सन्देह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से
देखा, और सिर झुका लिया। हीरा ने कहा-गया के घर से नाहक भागे। अब
जान न बचेगी।
मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया-कहते हैं, भगवान् सबके ऊपर
दया करते हैं। उन्हें हमारे ऊपर क्यों दया नहीं आती?
'भगवान् के लिए हमारा मरना-जीना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है,
कुछ दिन उनके पास तो रहेंगे। एक बार भगवान् ने उस लड़की के रूप में
हमें बचाया था। क्या अब न बचायेंगे!
'यह आदमी छुरी चलायेगा। देख लेना।'
'तो क्या चिन्ता है। मांस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी-न-किसी काम आ
जायँगी।
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