Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 249 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
रात-भर गाना होता रहा। तबले की धमक मेरे कानों में आ रही थी। जी
चाहता था, चलकर देख पर साहस न होता था। मैं किसी को मुँह कैसे
दिखाऊँगा? कहीं किसी ने पिताजी का जिक्र छेड़ दिया तो मैं क्या
करूँगा!
प्रातःकाल रामचन्द्र की बिदाई होनेवाली थी। मैं चारपाई से उठते ही
आँखें मलता हुआ चौपाल की ओर भागा। डर रह था कि कहीं रामचन्द्र चले न
गये हों। पहुँचा तो देखा, तवायफों की सवारियाँ जाने को तैयार हैं।
बीसों आदमी हसरत से नाक-मुँह बनाये उन्हें घेरे खड़े हैं। मैंने
उनकी ओर आँख न उठायी। सीधा रामचन्द्र के पास पँहुचा। लक्ष्मण और
सीता बैठे रो रहे थे, और रामचन्द्र खड़े काँधे पर लुटिया-डोर डाले
उन्हें समझा रहे थे। मेरे सिवा वहाँ कोई न था। मैंने कुण्ठित स्वर
में रामचन्द्र से पूछा-क्या तुम्हारी बिदाई हो गयी?
रामचन्द्र-हाँ, हो तो गयी। हमारी बिदाई ही क्या? चौधरी साहब ने कह
दिया, जाओ, चले जाते हैं।
'क्या रुपये और कपड़े नहीं मिले?'
'अभी नहीं मिले। चौधरी साहब कहते हैं इस वक्त बचत में रुपये नहीं
है। फिर पाकर ले जाना।'
'कुछ नहीं मिला?'
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré