Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 247 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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यह फिर क्या हुआ। आबदी तो उनके गले में बाहें डाले देती है। अबकी
पिताजी जरूर उसे पीटगे। चुडै़ल को जरा भी शर्म नहीं!
एक महाशय ने मुस्कराकर कहा-यहाँ तुम्हारी दाल न गलेगी आबदीजान! और
दरवाजा देखो।
बात तो इन महाशय ने मेरे मन की कही और बहुत ही उचित कही; लेकिन न
जाने क्यों पिताजी ने उनकी ओर कुपित नेत्रों से देखा और मूँछों पर
ताव दिया। मुँह से तो कुछ न बोले; पर उनके मुख को आकृति चिल्लाकर
सरोष शब्दों में कह रही थी-तू बनिया मुझे समझता क्या है? यहाँ ऐसे
अवसर पर जान तक निसार करने को तैयार हैं, रुपये की हकीकत ही क्या!
तेरा जी चाहे, आजमा ले। तुझसे दूनी रकम न दे डालें तो मुँह न
दिखाऊँ! महान आश्चर्य! घोर अनर्थ! अरे जमीन, तू फट क्यों नहीं जाती!
आकाश, तू फट क्यों नहीं पड़ता? अरे, मुझे मौत क्यों नहीं आ
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