Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 214 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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सात साल गुजर गये। विप्रजी विप्र से महाजन हुए, शङ्कर किसान से मजूर
हो गया। उसका छोटा भाई मंगल उससे अलग हो गया था। एक साथ रहकर दोनों
किसान थे, अलग होकर मजूर हो गये थे। शङ्कर ने चाहा कि द्वेष की आग
भड़कने न पाये, किन्तु परिस्थिति ने उसे विवश कर दिया। जिस दिन
अलग-अलग चूल्हे जले, वह फूट फूटकर गया। आज से भाई-भाई शत्रु हो
जायेंगे, एक रोयेगा तो दूसरा हँसेगा, एक के घर मातम होगा, तो दूसरे
के घर गुलगुले पकेंगे। प्रेम का बन्धन, खून का बन्धन, दूध का बन्धन
आज टूटा जाता है। उसने भगीरथ-परिश्रम से कुल-मर्यादा का वृक्ष लगाया
था, उसे अपने रक्त से सींचा था, उसका जड़ से उखड़ना देखकर उसके हृदय
के टुकड़े हुए जाते थे। सात दिनों तक उसने दाने की सूरत तक न देखी।
दिन-भर जेठ की धूप में काम करता और रात को मॅुह लपेट कर सो रहता। इस
भीषण वेदना और दुस्सह कष्ट ने रक्त को जला दिया, मांस और मज्जा को
घुला दिया। बीमार पड़ा तौ महीनों खाट से न उठा। अब गुजर-बसर कैसे
हो? पाँच बीघे के आधे खेत रह गये, एक बैल रह गया, खेती क्या खाक
होती!
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