Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 206 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
महादेव घर पहुँचा, लो अभी कुछ अँधेरा था। रास्ते में एक कुत्ते के
सिवा और किसी से भेंट न हुई, और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम
नहीं होता। उसने कलसे को एक नाँद में छिपा दिया और उसे कोयले से
अच्छी तरह ढंँककर अपनी कोठरी में रख आया। जब दिन निकल आया, तो वह
सीधे पुरोहितजी के घर पहुँचा। पुरोहितजी पूजा पर बैठे सोच रहे थे-कल
ही मुकदमा की पेशी है, और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं-जजमानों में
कोई सॉस भी नहीं लेता। इतने में महादेव ने पालागन की। पंडितजी ने
मुँह फेर लिया। यह अमंगल-मूर्ति कहाँ से आ पहुंँची, मालूम नहीं,
दाना भी मयस्सर होगा या नहीं। रुष्ट होकर पूछा-'क्या है, जी, क्या
कहते हो? जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते हैं?" महादेव ने
कहा-'महाराज, आज मेरे यहॉ सत्यनारायण की कथा है।'
पुरोहितजी विस्मित हो गये। कानों पर विश्वास न हुआ। महादेव के घर
कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने घर से किसी भिखारी
के लिए भीख निकालना। पूछा-'आज क्या है?'
महादेव बोला-'कुछ नहीं, ऐसी ही इच्छा हुई कि आज भगवान्की कथा सुन,
लूँ।
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré