Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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"एक दॉव और खेल लो। तुम तो पहिले ही हाथ में हुच गये।।
'नहीं भैया, अब अंधेरा हो गया।
'तुम्हारा अभ्यास छूट गया।
'खेलने का समय कहाँ मिलता है भैया?'
हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते-जलते पड़ाव पर पहुँच गये।
गया चलते-चलते बोला-कल यहाँ गुल्ली-डण्डा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी
खेलेंगे। तुम भी आओगे? जब तुम्हें फुरसत हो तभी खिलाड़ियों को
बुलाऊँ।
मैने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस
आदमियों की मण्डली थी। कई मेरे लड़कपन के साथी निकले। अधिकांश युवक
थे, जिन्हें मै पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा
तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका वह नैपुण्य देखकर मैं चकित हो
गया। टाँड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बात करती। कल की-सी वह झिझक,
वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसने
प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता,
तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डण्डे की चोट खाकर गुल्ली दो सौ गज खबर
लाती थी।
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