Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Auteur: प्रेमचंद
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'असम्भव!'
'असम्भव सम्भव हो जायगा!'
मैं साश्चर्य उसका मुँह देखने लगा। जहीन-से-जहीन लड़का भी अपनी
सफलता का दावा इतने निर्विवाद रूप से न कर सकता था । मैंने सोचा, वह
प्रश्न-पत्र उड़ा लेता होगा। मैंने प्रतिज्ञा की, अबकी इसकी एक चाल
भी न चलने दूँगा। देखूँ, कितने दिन इस कक्षा में पड़ा रहता है। आप
घबड़ाकर निकल जायगा। वार्षिक परीक्षा के अवसर पर मैंने असाधारण
देख-भाल से काम लिया, मगर जब सूर्यप्रकाश का उत्तर-पत्र देखा, तो
मेरे विस्मय की सीमा न रही। मेरे दो पर्चे थे, दोनों ही में उसके
नम्बर कक्षा में सबसे अधिक थे। मुझे खूब मालूम था कि वह मेरे किसी
पर्चे का कोई प्रश्न भी हल नहीं कर सकता। मैं इसे सिद्ध कर सकता था;
मगर उसके उत्तर-पत्रों को क्या करता!
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