Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 107 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्तर और रह गया।
मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कहीं भाई साहब एक साल और फेल
हो जायें, तो मैं उनके बराबर हो जाऊँ, फिर वह किस आधार पर मेरी
फजीहत कर सकेंगे; लेकिन मैने इस कमीने विचार को दिल से बलपूर्वक
निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डाँटते हैं।
मुझे इस वक्त अप्रिय लगता है अवश्य; मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही
असर हो कि मैं दनादन पास हो जाता हूँ और इतने अच्छे नम्बरों से।
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