Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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विप्र महाराज साल में दो बार खलिहानी किया करते थे। शङ्कर ने दिल
में कहा, सवा सेर गेहूँ इन्हें क्या लौटाऊँ, पंसेरी के बदले कुछ
ज्यादा खलिहानी दे दूंँगा, यह भी समझ जायँगे, मैं भी समझ जाऊँगा।
चैत में जब विप्रजी पहुँचे तो उन्हें डेढ पसेरी के लगभग गेहूँ दे
दिया और अपने को उऋण समझकर उसकी कोई चरचा न की। विप्रजी ने फिर कभी
न माँगा। सरल शङ्कर को क्या मालूम था कि यह सवा सेर गेहूँ चुकाने के
लिए मुझे दूसरा जन्म लेना पड़ेगा।
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