Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 103 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tiempo0:00
Velocidad (WPM)0.0
Precisión100.0%
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente. · Retroceso desactivado — continua incluso tras un error.
दुगुना नहीं, चौगुना हो जाय, या आधा ही रहे, मेरी बला से; लेकिन
परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह
दिया-'समय की पाबन्दी' पर एक निबन्ध लिखो, जो चार पन्नों से कम न
हो। अब आप कापी सामने खोले कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए। कौन
नहीं जानता कि समय की पाबन्दी बहुत अच्छी बात है, इससे आदमी के जीवन
में सयम आ जाता है, दूसरों का उस पर स्नेह होने लगता है और उसके
कारोबार में उन्नति होती है। लेकिन इस जरा-सी बात पर चार पन्ने कैसे
लिखें? जो बात एक वाक्य में कही जा सके, उसे चार पन्नों में लिखने
की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत कहता हूँ। यह तो समय की किफायत नहीं,
बल्कि, उसका दुरुपयोग है कि व्यर्थ में किसी बात को ठूँस दिया जाय।
हम चाहते हैं, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले।
मगर नहीं, आपको चार पन्ने रँगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए। और पन्ने
भी पुरे फुल्सकेप के आकार के। यह छात्रों पर अत्याचार नहीं तो और
क्या है? -अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की
पाबन्दी पर संक्षेप में एक निबन्ध लिखो, जो चार पन्ने से कम न हो।
ठीक!
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente.
Sin iniciar