Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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एक दिन सचमुच यही बात हो गयी। ईश्वरी घर में था। शायद अपनी माता से
कुछ बात-चीत करने में देर हो गयी। यहाँ दस बज गये। मेरी आँखें नींद
से पक रही थीं; मगर बिस्तर कैसे लगाऊँ? कुँवर जो ठहरा। कोई साढ़े
ग्यारह बजे महरा आया। बड़ा मुँहलगा नौकर था। घर के धंधों में मेरा
बिस्तर लगाने की उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आयी, से भागा हुआ
आया। मैंने ऐसी डाँट बतायी कि उसने भी याद किया होगा।
ईश्वरी मेरी डाँट, सुनकर बाहर निकल आया और बोला-तुमने बहुत अच्छा
किया। यह सब हरामखोर इसी व्यवहार के योग्य हैं।
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