Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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खुदाई फौजदारों की एक फौज बना ली थी और उसके आतंक से शाला पर शासन
करता था। मुख्य अधिष्ठाता की आज्ञा टल जाय, मगर क्या मजाल कि कोई
उसके हुक्म की अवज्ञा कर सके। स्कूल के चपरासी और अर्दली उससे थर-थर
काँपते थे। इंस्पेक्टर का मुआइना होनेवाला था, मुख्य अधिष्ठाता ने
हुक्म दिया कि लड़के निर्दिष्ट समय के आध घण्टा पहले आ जायँ। मतलब
यह था कि लड़कों को मुआइने के बारे में कुछ जरूरी बातें बता दी
जायँ, मगर दस बज गये, इंस्पेक्टर साहब आकर बैठ गये, और मदरसे में एक
लड़का भी नहीं। ग्यारह बजे सब छात्र इस तरह निकल पड़े, जैसे कोई
पिंजरा खोल दिया गया हो। इंस्पेक्टर साहब ने कैफियत में
लिखा-डिसिप्लिन बहुत खराब है। प्रिंसिपल साहब की किरकिरी हुई,
अध्यापक बदनाम हुए, और यह सारी शरारत सूर्यप्रकाश की थी। मगर बहुत
पूछ-ताछ करने पर भी किसी ने सूर्यप्रकाश का नाम तक न लिया। मुझे
अपनी संचालन-विधि पर गर्व था। ट्रेनिंग कालेज में इस विषय में मैंने
ख्याति प्राप्त की थी। मगर यहाँ मेरा सारा संचालन-कौशल जैसे मोर्चा
खा गया था। कुछ अक्ल ही काम न करती कि शैतान को कैसे सन्मार्ग पर
लायें। कई बार अध्यापकों की बैठक हुई। पर यह गिरह न खुली। नई
शिक्षा विधि के अनुसार मै दंडनीति का पक्षपाती न था, मगर यहाँ हम इस
नीति से केवल इसलिए विरक्त थे कि कहीं उपचार रोग से भी असाध्य न हो
जाय। सूर्यप्रकाश को स्कूल से निकाल देने का प्रस्ताव भी किया गया,
पर इसे अपनी अयोग्यता का प्रमाण समझकर हम इस नीति का व्यवहार करने
का साहस न कर सके। बीस-बाईस अनुभवी और शिक्षण-शास्त्र के आचार्य एक
बारह-तेरह साल के उद्दंड बालक का सुधार न कर सके, यह विचार बहुत ही
निराशाजनक था। यों तो सारा स्कूल उससे त्राहि-त्राहि करता था, मगर
सबसे ज्यादा सकट मे मैं था, क्योंकि वह मेरी कक्षा का छात्र था, और
उसकी शरारतों का कुफल मुझे भोगना पड़ता था। मैं स्कूल आता, तो हरदम
यही खटका लगा रहता था कि देखें आज क्या विपत्ति आती है। एक दिन मैने
अपनी मेज की दराज खोली, तो उसमें से एक बड़ा-सा मेंढक निकल पड़ा।
मैं चौंककर पीछे हटा तो क्लास में एक शोर मच गया। उसकी ओर सरोष
नेत्रों से देखकर रह गया। सारा घटा उपदेश में बीत गया और वह पट्ठा
सिर झुकाये नीचे मुस्करा रहा था। मुझे आश्चर्य होता था कि यह नीचे
की कक्षाओं में कैसे पास हुआ। एक दिन मैंने गुस्से से कहा -- तुम इस
कक्षा से उम्र भर नहीं पास हो सकते। सूर्यप्रकाश ने अविचलित भाव से
कहा -- आप मेरे पास होने को चिन्ता न करें। मै हमेशा पास हुआ हूँ और
अबकी भी हूँगा।
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