Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 128 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tiempo0:00
Velocidad (WPM)0.0
Precisión100.0%
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente. · Retroceso desactivado — continua incluso tras un error.
ज्यों-ज्यों लॉटरी का दिन समीप आता जाता था, हमारे चित्त की शांति
उड़ती जाती थी। हमेशा उसी ओर मन टँगा रहता। मुझे आप-ही-आप अकारण
सन्देह होने लगा, कि कहीं विक्रम मुझे हिस्सा देने से इनकार कर दे
तो मैं क्या करूँ। साफ इनकार कर जाय कि तुमने टिकट में साझा किया ही
नहीं। न कोई तहरीर है, न कोई दूसरा सबूत। सब कुछ विक्रम की नीयत पर
है। उसकी नीयत जरा भी डांँवाडोल हुई और मेरा काम तमाम। कहीं फरियाद
नहीं कर सकता, मुंँह तक नहीं खोल सकता। अब अगर कुछ कहूँ भी तो कोई
लाभ नहीं। अगर उसकी नीयत में फितूर आ गया है, तब तो वह अभी से इनकार
कर देगा; अगर नहीं आया है, तो इस सन्देह से उसे मर्मान्तक वेदना
होगी। आदमी ऐसा तो नहीं है। मगर भई, दौलत पाकर ईमान सलामत रखना कठिन
है! अभी तो रुपये नहीं मिले। इस वक्त ईमानदार बनने में क्या खर्च
होता है। परीक्षा का समय तो तब आयेगा, जब दस लाख रुपये हाथ में
होंगे। मैंने अपने अन्तःकरण को टटोला-अगर टिकट मेरे नाम का होता और
मुझे दस लाख मिल जाते, तो क्या मैं आधे रुपये बिना कान-पूंछ हिलाये
विक्रम के हवाले कर देता?
Pulsa iniciar y escribe las líneas exactamente.
Sin iniciar