Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 89 of 251
Author: प्रेमचंद
Time0:00
Speed (WPM)0.0
Accuracy100.0%
Press start and type the lines exactly as shown. · Backspace is disabled — keep going even after a mistake.
चुपके से मुहरा वहीं रख दीजिए।
मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले--मैने चाल चली ही कब थी,
मिर्जा--आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए--उसी घर में।
मीर--उस घर में क्यों रखूँ? हाथ से मुहरा छोड़ा कब था?
मिर्जा--मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी
पिटते देखा तो धाँधली करने लगे!
मीरा--धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है। धाँधली से
कोई नहीं जीतता। मीर--मुझे क्यों मात होने लगी।
मिर्जा--तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रखा था।
मीर--वहाँ क्यों रखूँ? नहीं रखता।
मिर्जा--क्यों न रखिएगा? आप को रखना होगा।
तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था न
वह। अप्रासंगिक बातें होने लगीं। मिर्जा बोले--किसी ने खानदान में
शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला
किये, आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने
ही से कोई रईस नहीं हो जाता।
मीर--क्या! घास आपके अब्बाजान छोलते होंगे! यहाँ तो पीढ़ियों से
शतरंज खेलते चले आते हैं।
Press start and type the lines exactly as shown.
Not started