Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की
बोटी-बोटी काँप रही थी! बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे; पर भय के
मारे गिरते-पड़ते भागे जाते थे क्योकि वह जरा भी चाल धीमी हो जाने
पर जोर से डडा जमा देता था।
राह में गाय बैलों का एक रेवड़ हरे-हरे हार में चरता नजर आया। सभी
जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपल। कोई उछलता था, कोई आनन्द से बैठा
पागुर करता था। कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब।
किसी को चिन्ता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुःखी
हैं!
सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ, कि यह परिचित राह है। हाँ, इसी रास्ते
से गया उन्हें ले गया था। वही खेत, वही बाग़ वही गाँव मिलने लगे।
प्रतिक्षण उनकी चाल तेज़ होने लगी। सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब
हो गयी। अहा! यह लो! अपना ही हार आ गया। इसी कुएँ पर हम पुर चलाने
आया करते थे। हाँ, यही कुआँ है।
मोती ने कहा-हमारा घर नगीच आ गया।
हीरा बोला-भगवान् की दया है। 'मैं तो अब घर भागता हूँ।'
'यह जाने देगा!'
'इसे मै मार गिराता हूँ।'
'नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से हम आगे न जायेंगे।'
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