Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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सूर्यप्रकाश के सजल नेत्रों में हसरत से भरा हुआ आनन्द चमक उठा,
बोला -- वह मुझे एक मिनट के लिए भी न छोड़ता था। मेरे साथ बैठता,
मेरे साथ खाता, साथ सोता। मैं ही उसका सब कुछ था। आह! संसार में
नहीं है। मगर मेरे लिए वह अब भी उसी तरह जीता-जागता है। मैं जो कुछ
हूँ, उसी का बनाया हुआ हूँ। अगर वह दैवी विधान की भाँति मेरा
पथ-प्रदर्शक न बन जाता, तो शायद आज मैं किसी जेल में पड़ा होता है।
एक दिन मैंने कह दिया था -- अगर तुम रोज नहा न लिया करोगे तो मै
तुमसे न बोलूँगा। नहाने से वह न जाने क्यों जी चुराता था। मेरी इस
धमकी का फल यह हुआ कि वह नित्य प्रातःकाल नहाने लगा। कितनी ही सर्दी
क्यों न हो, कितनी ही ठंडी हवा चले, लेकिन वह स्नान अवश्य करता था।
देखता रहता था, मैं किस बात से खुश होता
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